कलाकार अमूर्त को मूर्त रूप देता है, लोककलाओं से जुड़े रहना जरूरी : डॉ. राकेश किराडू

ट्रिपल एस ओ न्यूज, बीकानेर। अजित फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक सप्ताहीय लोककला ‘फड़ चित्रकला कार्यशाला’ में मुख्य प्रशिक्षक, सुप्रसिद्ध चित्रकार एवं डॉ. राकेश किराडू ने कहा कि किसी भी कलाकार की सृजनात्मक यात्रा तब तक पूर्ण नहीं हो सकती, जब तक वह अपनी लोक परंपराओं, संस्कृति और जड़ों से जुड़ा न हो। लोककलाएं हमारी सांस्कृतिक पहचान की वाहक हैं और कलाकार को अपनी रचनात्मकता के साथ-साथ लोकजीवन की संवेदनाओं को भी समझना आवश्यक है।

कलाकार अमूर्त को मूर्त रूप देता है, लोककलाओं से जुड़े रहना जरूरी : डॉ. राकेश किराडू
कलाकार अमूर्त को मूर्त रूप देता है, लोककलाओं से जुड़े रहना जरूरी : डॉ. राकेश किराडू


उन्होंने कहा कि कलाकार वह सर्जक होता है जो कल्पना को आकार देता है, निराकार को साकार और अमूर्त भावों को मूर्त रूप प्रदान करता है। यही कला की सबसे बड़ी शक्ति है। डॉ. किराडू ने फड़ चित्रकला के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि राजस्थान की यह प्राचीन लोकचित्र शैली वर्तमान में मुख्य रूप से भीलवाड़ा क्षेत्र तक सीमित रह गई है। ऐसे में आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी को इससे जोड़ा जाए और इसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं।

उन्होंने चित्रकला की विभिन्न शैलियों, रंग-संयोजन और रेखांकन की विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि किसी भी चित्र की शैली को उसकी संरचना, रंगों के प्रयोग और प्रस्तुति के आधार पर पहचाना जा सकता है। कार्यशाला के माध्यम से प्रतिभागियों को फड़ चित्रकला के इतिहास, तकनीक, पारंपरिक रंगों के उपयोग और चित्र निर्माण की विधियों की सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक जानकारी दी जा रही है।

कार्यशाला के दौरान जयश्री सुथार, निशा सुथार एवं राम भादाणी ने प्रतिभागियों को मानव आकृति चित्रण, अनुपात, रेखांकन और फड़ कला की बारीक तकनीकों का प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया। प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक अभ्यास करते हुए पारंपरिक शैली में चित्रांकन की विभिन्न विधियां सीखीं।

कार्यक्रम की शुरुआत में संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने कार्यशाला के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अजित फाउंडेशन का प्रयास केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध लोककलाओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में सार्थक पहल करना है। उन्होंने बताया कि एक सप्ताह तक चलने वाली इस कार्यशाला में ‘लर्निंग बाय डूइंग’ पद्धति के तहत प्रतिभागियों को स्वयं अभ्यास कर सीखने का अवसर प्रदान किया जा रहा है, जिससे वे कला की बारीकियों को बेहतर ढंग से समझ सकें।

उल्लेखनीय है कि कार्यशाला में लगभग 52 युवा-युवतियां उत्साहपूर्वक भाग ले रही हैं। युवाओं की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि पारंपरिक लोककलाओं के प्रति नई पीढ़ी में रुचि बढ़ रही है, जो इनके संरक्षण और भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

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