भा.कृ.अनु.प.-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान का 34वां स्थापना दिवस समारोहपूर्वक आयोजित

ट्रिपल एस ओ न्यूज, बीकानेर, 27 सितंबर। भा.कृ.अनु.प.-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान (ICAR-CIAH), का 34वां स्थापना दिवस रविवार को संस्थान परिसर में गरिमापूर्ण वातावरण में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के पूर्व सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के पूर्व महानिदेशक पद्मभूषण डॉ. आर.एस. परोदा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

भा.कृ.अनु.प.-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान का 34वां स्थापना दिवस समारोहपूर्वक आयोजित
 भा.कृ.अनु.प.-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान का 34वां स्थापना दिवस समारोहपूर्वक आयोजित


डॉ. सुमंत व्यास, कुलगुरु, राजस्थान पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय तथा प्रो. विमला ढुकवाल कुलगुरु, कृषि विश्वविद्यालय, कोटा विशिष्ट अतिथि रहे। डॉ. अनिल पूनिया निदेशक, ICAR-राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र  तथा संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. ओ.पी. पारीक विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. डी.के. समदिया के स्वागत उद्बोधन से हुआ। अतिथियों ने शुष्क क्षेत्रों में उगाए जाने वाले फलों एवं फसलों के संरक्षण, अनुसंधान तथा उनके पोषणीय महत्व पर प्रकाश डाला।


संस्थान निदेशक डॉ. विश्वबंधु पटेल ने संस्थान की वर्ष 1993 से अब तक की शोध एवं तकनीकी यात्रा तथा भविष्य की अनुसंधान दिशा प्रस्तुत की। उन्होंने शुष्क क्षेत्र की जैव-विविधता के संरक्षण, देशज एवं कम उपयोग में आने वाली फसलों, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, टिश्यू कल्चर, उन्नत किस्मों, जैव-तकनीकी हस्तक्षेपों तथा मूल्य संवर्धन को संस्थान की प्राथमिकताओं में बताया। इस अवसर पर संस्थान के 25 शोध प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया, जो शुष्क बागवानी के विभिन्न क्षेत्रों में संस्थान की वैज्ञानिक उपलब्धियों को दर्शाते हैं। मुख्य अतिथि डॉ. आर.एस. परोदा ने संस्थान परिसर में टिश्यू-कल्चर से तैयार खजूर के पौधे का रोपण भी किया।


शुष्क क्षेत्रों की जैव-विविधता एवं किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

अपने संबोधन में डॉ. आर.एस. परोदा ने शुष्क क्षेत्रों की समृद्ध जैव-विविधता तथा देशज पौधों एवं कृषि संसाधनों के संरक्षण, संवर्धन और वैज्ञानिक उपयोग पर बल दिया। उन्होंने पीळू, काचरी, करोंदा, केर सहित अन्य देशज एवं कम उपयोग में आने वाली फसलों की पोषणीय, न्यूट्रास्यूटिकल एवं औषधीय संभावनाओं के वैज्ञानिक दोहन तथा मूल्य संवर्धन की आवश्यकता बताई।


उन्होंने कहा कि शुष्क क्षेत्रों में कृषि को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाने के लिए फसल विविधीकरण आवश्यक है। फल, सब्जी, देशज फसलों एवं पशुधन आधारित एकीकृत कृषि प्रणालियों को अपनाकर किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने ‘हर खेत को पेड़ पर फलदार पेड़’ जैसे प्रयासों को बढ़ावा देने का आह्वान किया।


डॉ. परोदा ने बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप देशज एवं जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों के विकास को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। उन्होंने अनुसंधान को किसानों की समस्याओं एवं बाजार से जोड़ने, एफपीओ, स्वयं सहायता समूहों और उद्यमियों के माध्यम से तकनीकों के व्यावसायीकरण पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि शुष्क बागवानी किसानों की समृद्धि, पोषण सुरक्षा, रोजगार सृजन और पारिस्थितिकीय लचीलेपन का प्रभावी माध्यम बन सकती है तथा ‘विकसित भारत @ 2047’ के लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।


विकसित भारत 2047’ के लिए जलवायु-सहिष्णु शुष्क बागवानी पर मंथन

स्थापना दिवस समारोह का प्रमुख आकर्षण ‘विकसित भारत 2047 के लिए शुष्क बागवानी की जलवायु-अनुकूलन क्षमता’ विषय पर आयोजित विचार-मंथन सत्र रहा। सत्र में डॉ. ओ.पी. पारीक, संस्थापक निदेशक, ICAR-CIAH, डॉ. पी.एल. सरोज, डॉ. एस.के. शर्मा सहित संस्थान के वैज्ञानिकों तथा विभिन्न हितधारक किसानों ने सक्रिय भागीदारी की।


मंथन सत्र में शुष्क बागवानी के लिए जलवायु-सहिष्णु उत्पादन प्रणालियों, देशज एवं पारंपरिक फसलों के पुनर्स्थापन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, विविधीकरण, मूल्य संवर्धन तथा किसानों की आय में वृद्धि जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। राजस्थान में जैतून (Olive) की खेती के पुनर्स्थापन एवं विस्तार, इसके लिए उपयुक्त तकनीक एवं उत्पादन रणनीतियों पर भी विशेष चर्चा की गई।


इसके साथ ही शुष्क क्षेत्र की अन्य संभावनाशील बागवानी फसलों, स्थानीय जैव-विविधता, जल-कुशल उत्पादन, फसल विविधीकरण, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन तथा बाजार आधारित उत्पादन प्रणालियों को बढ़ावा देने पर विचार-विमर्श हुआ।


वैज्ञानिकों और किसानों के बीच हुए संवाद में शुष्क क्षेत्र में फसल एवं किस्म चयन, जल उपलब्धता, तकनीकी अपनाने, उत्पादन की स्थिरता, प्रसंस्करण तथा बाजार से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर विचार साझा किए गए। सत्र का प्रमुख उद्देश्य प्रयोगशाला से खेत और खेत से बाजार तक एकीकृत दृष्टिकोण विकसित करना रहा, ताकि शुष्क क्षेत्र की बागवानी को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला, आर्थिक रूप से व्यवहार्य एवं पोषण-सुरक्षित बनाया जा सके।


डॉ मुकेश बेरवाल ने बताया कि समारोह में संस्थान के वैज्ञानिकों, तकनीकी एवं प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारियों के साथ पूर्व निदेशक, कृषि वैज्ञानिक, विद्यार्थी, कृषक प्रतिनिधि तथा विभिन्न भा.कृ.अनु.प. संस्थानों, कृषि एवं पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों तथा राज्य कृषि विभागों के अधिकारी एवं वैज्ञानिक उत्साहपूर्वक शामिल हुए।


34वें स्थापना दिवस समारोह ने ICAR-CIAH की वर्ष 1993 से 2026 तक की गौरवपूर्ण वैज्ञानिक यात्रा को स्मरण करने के साथ-साथ वर्ष 2047 तक जलवायु-सहिष्णु, टिकाऊ, लाभकारी एवं पोषण-सुरक्षित शुष्क बागवानी के निर्माण की दिशा में नई शोध प्राथमिकताओं और सामूहिक प्रयासों के लिए साझा मंच प्रदान किया

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