ट्रिपल एस ओ न्यूज, बीकानेर। अजित फाउण्डेशन द्वारा आयोजित मासिक संवाद के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘‘अतीत की प्रतिध्वनियां: भारतीय उपमहाद्वीप की भौतिक संस्कृति‘‘ विषय पर अपनी बात रखते हुए इतिहासवेता डॉ. नीतिन गोयल ने कहा कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं होता। इतिहास उन साधारण वस्तुओं में भी जीवित रहता है जिन्हें हम प्रतिदिन देखते हैं, छूते हैं और जिनका उपयोग करते हैं। ’मौन वस्तुएँ, लिखित इतिहास से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से अतीत की कहानी कहती हैं। उन्होंने अपने उद्बोधन में सुदेषना गुहा की कृति ‘‘ए हिस्ट्री ऑफ इण्डिया थ्रू 75 ऑब्जेक्ट’’ के केन्द्र में रखते हुए कहा कि इस पुस्तक में वस्तुओं के माध्यम से इतिहास को लिखने की नई शैली में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह किताब गहराई से यह मूल्यांकित करती है कि वस्तुएँ चाहे प्रामाणिक हों या प्रतिकृति या प्रतिनिधित्व के माध्यम से प्रदर्शित हों, उनके शक्तिशाली भौतिक स्वरूप और अर्थ में बदलाव के साथ जुड़ना, इतिहास के अध्ययन में कितना महत्वपूर्ण है।
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| अतीत की प्रतिध्वनियां: भारतीय उपमहाद्वीप की भौतिक संस्कृति’ विषय पर संवाद एवं फड़ चित्रकला कार्यशाला का समापन |
इस पुस्तक की सबसे अनोखी बात यह है कि साधारण वस्तुएं अक्सर ऐतिहासिक स्रोत बन जाती हैं और यह पुस्तक पाठक को यह देखने का मार्गदर्शन देती है कि इतिहास स्थिर नहीं है बल्कि हमेशा निर्माण में होता है। उन्होंने पुस्तक में सम्मिलित 75 ऑब्जेक्ट में से मुख्य ऑक्जेक्ट के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि इसमें फड़ चित्रषैली, एमबस्ट्र कार, गोदरेज ताला, एल.आई.सी सिममबल, कावड़ शैली, अमूल गर्ल आदि कई ऐसे वस्तुएं ली गई है जोकि हमारे जीवन की दिनचर्या में शामिल हुआ करती थी।
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| अतीत की प्रतिध्वनियां: भारतीय उपमहाद्वीप की भौतिक संस्कृति’ विषय पर संवाद एवं फड़ चित्रकला कार्यशाला का समापन |
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए शिक्षाविद् डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि हमें फड़ चित्रकला को आगे बढ़ाना चाहिए। जिससे लुप्त हो रही हमारी लोककलाओं का पुनरूत्थान होगा। उन्होंने युवा-युवतियों को संबोधित करते हुए कहा कि इतिहास हमें जीवन में वह सबकुछ सीखाता है जिनको हमारे पूर्वजों ने जीया और हमारे लिए छोड़ा। हमें इतिहास का अध्ययन करते हुए नवीन प्रयासों की तरह निरन्तर बढ़ते रहना चाहिए।
कार्यक्रम के अगल चरण में फड़ चित्रकला कार्यशाला के समापन समारोह में मुख्य अतिथि वरिष्ठ चित्रकार डॉ. राकेश किराड़ू ने अपनी बात रखते हुए कहा कि चाहे कोई भी कला हो उसको सीमाएं बांध नहीं सकती है। संगीत हो या लोक कला उसका कैनवास पूरा विष्व होता है। कला बंधन को तोड़ती है और व्यक्तियों को जोड़ने का कार्य करती है। कला ही एक ऐसा माध्यम है जहां हम अपनी अभिव्यक्ति को मुखरित कर सकते है। उसका साधन शब्द या चित्र हो सकते है।
संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने कहा कि हमें अपनी लुप्त हो रही चित्रशैलियों पर कार्य करना आवश्यक है। लोक कलाओं को जीवित रखने हेतु इस प्रकार की कार्यशालाओं का निरन्तर आयोजन किया जाए तो नए कलाकार तैयार होगें तथा उनको एक मंच मिलेगा।
कार्यक्रम के अंत में शिक्षाविद् विजयशंकर आचार्य ने सभी आगुन्तुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया। मंचस्थ विद्वजनों द्वारा कार्यषाला में हिस्सा लेने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में नदीम अहमद नदीम, अरमान नदीम, हनीफ उस्ता, गिरिराज पारीक मौहम्मद फारूक, सुनीता श्रीमाली, उषा बिस्सा, शिव दाधीच, बाबूलाल, गौरीशंकर शर्मा सहित कई युवा-युवतियां उपस्थित रहे।


