बीकानेर, 4 जून 2026। क्षत्रिय सभा एवं ट्रस्ट, बीकानेर संभाग के तत्वावधान में युवाओं, महिलाओं एवं बालिकाओं को आत्मरक्षा के प्रति जागरूक करने तथा राजस्थानी संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से सात दिवसीय निशुल्क आत्मरक्षा एवं साफा प्रशिक्षण शिविर का आयोजन 24 जून से 30 जून 2026 तक किया जाएगा। शिविर प्रतिदिन सायं 6:00 बजे से 7:30 बजे तक स्थानीय बिदासर हाउस स्थित तीर्थ स्तंभ परिसर में आयोजित होगा।
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| 24 जून से शुरू होगा क्षत्रिय सभा का सात दिवसीय निशुल्क आत्मरक्षा एवं साफा प्रशिक्षण शिविर |
शिविर के बैनर विमोचन अवसर पर देवी सिंह भाटी ने कहा कि भारतीय परंपरा में शिक्षा के साथ शस्त्र विद्या का भी विशेष महत्व रहा है। वर्तमान समय में स्वयं, परिवार और समाज की सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा का प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है। ऐसे शिविर युवाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और सुरक्षा के प्रति जागरूकता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सभा के अध्यक्ष करण प्रताप सिंह सिसोदिया ने बताया कि शिविर में महिलाओं, युवाओं एवं बालिकाओं को आत्मरक्षा के विभिन्न गुर सिखाए जाएंगे। इसके साथ ही राजस्थान की गौरवशाली परंपरा के प्रतीक साफा बांधने की कला का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सके।
शिविर संयोजक प्रदीप सिंह चौहान ने बताया कि आत्मरक्षा प्रशिक्षण के लिए गुजरात से अनुभवी प्रशिक्षक सोनलबा अपनी टीम सहित बीकानेर आएंगी। उनके निर्देशन में प्रतिभागियों को आधुनिक एवं प्रभावी आत्मरक्षा तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। उन्होंने अधिक से अधिक युवाओं एवं महिलाओं से इस निशुल्क शिविर में भाग लेकर लाभ उठाने की अपील की।
इस अवसर पर मोहन सिंह नाल, महावीर सिंह पवार, अजीत सिंह भाटी, रणवीर सिंह नोखड़ा एवं नवीन सिंह तंवर ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए ऐसे आयोजनों को समय की आवश्यकता बताया और समाज के लोगों से शिविर में सहभागिता का आह्वान किया।
बैनर विमोचन समारोह में तेज सिंह मेलिया, विक्रम सिंह बीका, नंदू सिंह फौजी, जालम सिंह भाटी, अजय पाल सिंह शेखावत, बृजमोहन सिंह चौहान, अमर सिंह हाड़ला, गिरधारी सिंह खिंदासर, एडवोकेट गिरिराज सिंह भाटी, विशाल सिंह सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
सभा के अनुसार शिविर का मुख्य उद्देश्य युवाओं में आत्मविश्वास का विकास करना, महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए सक्षम बनाना तथा राजस्थानी संस्कृति एवं परंपराओं के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देना है।

