मनुष्य की स्वतंत्रता ही जीवन का सबसे बड़ा मूल्य : डॉ. नंदकिशोर आचार्य

ट्रिपल एस ओ न्यूज, बीकानेर, 25 अक्टूबर 2026 अजित फाउण्डेशन की ओर से रविवार को प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘आखिरी उदारवादी और अन्य आलेख’ पर एक विशेष पुस्तक समीक्षा संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में साहित्य, इतिहास और समाज से जुड़े विद्वानों ने गुहा के वैचारिक दृष्टिकोण और समकालीन संदर्भों पर विस्तार से मंथन किया।

मनुष्य की स्वतंत्रता ही जीवन का सबसे बड़ा मूल्य : डॉ. नंदकिशोर आचार्य
मनुष्य की स्वतंत्रता ही जीवन का सबसे बड़ा मूल्य : डॉ. नंदकिशोर आचार्य


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए देश के ख्यातिनाम कवि एवं चिंतक डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि रामचंद्र गुहा के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे आंकड़ों के जाल में उलझने के बजाय व्यक्तियों की दृष्टि और जीवन की समग्रता को केंद्र में रखते हैं। उन्होंने कहा कि आज के समाज में केवल संकीर्ण विषय विशेषज्ञता के पीछे भागने से बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो सकता है; मनुष्य को जीवन की समग्रता को समझना होगा। डॉ. आचार्य ने जोर देकर कहा कि गुहा की इस पुस्तक का केंद्रीय संदेश है—‘मनुष्य की स्वतंत्रता सबसे अधिक मूल्यवान है’। उन्होंने आधुनिकता की ओर बढ़ते कदमों के साथ उपजने वाली सामाजिक व नैतिक चुनौतियों के प्रति भी आगाह किया।

विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ इतिहासविद् डॉ. भंवर भादानी ने गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन और सेवाग्राम आश्रम की स्थापना के नैतिक आयामों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि राजनीति समय के साथ बदलती रहती है, लेकिन सकारात्मक विचारधारा युगों तक समाज का पथ प्रदर्शन करती है। सत्ता परिवर्तन के बावजूद समाज को अच्छे विचारों व कार्यों की निरंतरता बनाए रखनी चाहिए।

चार प्रमुख खंडों पर वक्ताओं का गहन विश्लेषण:

  • सेवाग्राम की नैतिक संरचना: महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय की इतिहास विभागाध्यक्ष व साहित्यकार डॉ. मेघना शर्मा ने ‘कहीं से 766 किलोमीटर दूर सेवाग्राम’ अध्याय की समीक्षा की। उन्होंने इसे गांधीवादी विरासत का पुनर्मूल्यांकन बताते हुए कहा कि भीष्म साहनी और लुई फिशर के संस्मरणों के जरिए आश्रम के अनुशासन, सादगी, न्यूनतम भोजन और सामुदायिक श्रम की संस्कृति को बेहद सजीव ढंग से उभारा गया है।
  • साहित्य एक संपूर्ण सामाजिक पारिस्थितिकी: राजकीय डूंगर महाविद्यालय के सह-आचार्य डॉ. ब्रजरतन जोशी ने पुस्तक के साहित्य खंड पर बात रखते हुए समाजशास्त्री पियरे बूर्दिए के सिद्धांत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गुहा साहित्य को महज रचनाओं के सौंदर्य तक सीमित नहीं रखते, बल्कि लेखक, आलोचक, प्रकाशक, पत्रिकाएं, शिक्षण संस्थाएं और पाठक मिलकर जो साहित्यिक पारिस्थितिकी तंत्र (इकोलॉजी) बनाते हैं, उसे सहानुभूतिपूर्ण स्मरण के साथ दर्ज करते हैं।
  • पर्यावरण प्रबंधन और आम जन: सिस्टर निवेदिता कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रीतेश व्यास ने ‘गरीबों के पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल’ अध्याय पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि अग्रवाल ने चिपको आंदोलन और दिल्ली में सीएनजी वाहनों के प्रयोग जैसे ठोस प्रयासों से यह स्थापित किया कि पर्यावरण संरक्षण केवल संभ्रांत वर्ग का विषय नहीं है, बल्कि इसके कुशल प्रबंधन में आम और वंचित वर्ग की भागीदारी सबसे निर्णायक होती है।
  • लोकतांत्रिक सहिष्णुता और प्रतिद्वंद्वी का सम्मान: इतिहास व्याख्याता डॉ. मुकेश हर्ष ने ‘वाजपेयी की नजर में नेहरू’ आलेख के माध्यम से स्वस्थ लोकतंत्र की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में नहीं है कि सभी एक जैसा सोचें, बल्कि इसमें है कि भिन्न विचारधारा वाले लोग भी एक-दूसरे के योगदान और असहमति के अधिकार का सम्मान करें।

कार्यक्रम के आरंभ में अजित फाउण्डेशन के समन्वयक संजय श्रीमाली ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी का संचालन किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य समाज में गंभीर चिंतन और पुस्तक पठन की संस्कृति को पुनर्जीवित करना है।

इस अवसर पर मधु आचार्य, गजानंद व्यास, नदीम अहमद, माणक सुथार, महेश उपाध्याय, अविनाश व्यास, आनन्द पुरोहित, जाकिर अदीब, सुनिता श्रीमाली, प्रमोद शर्मा, मनन, आनन्द छंगाणी, उषा बिस्सा, दीक्षा व्यास, गोपाल व्यास, प्रवीण प्रजापत, मनीष जोशी, ओमप्रकाश सुथार और इमरोज नदीम सहित नगर के अनेक गणमान्य साहित्यकार, बुद्धिजीवी व शोधार्थी उपस्थित रहे।

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