ट्रिपल एस ओ न्यूज, बीकानेर। कलाकार वह होता है जिसके अंतर्मन में उसका किरदार समाहित हो जाए और जब वही कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत बनकर प्रवाहित होती है, तो इतिहास बन जाती है। सांस्कृतिक नगरी बीकानेर में आहूजा परिवार ने इस कथन को पूरी निष्ठा से चरितार्थ किया है। बीकानेर दशहरा कमेटी द्वारा डॉ. करणी सिंह स्टेडियम में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक दशहरा महोत्सव एवं नगर के परकोटे में निकलने वाली भव्य झांकियों में आहूजा परिवार की लगातार तीन पीढ़ियां पिछले सात दशकों से दशानन रावण की भूमिका निभाती आ रही हैं।
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| बीकानेर की अनूठी सांस्कृतिक विरासत: तीन पीढ़ियों से आहूजा परिवार जीवंत कर रहा है 'दशानन रावण' का किरदार |
तीन पीढ़ियों का गौरवशाली सफर:
- प्रथम पीढ़ी: परिवार में इस परंपरा की नींव स्वर्गीय श्री माधव दास आहूजा ने रखी, जिन्होंने लगातार 23 वर्षों तक रावण का किरदार निभाकर जनमानस के दिल पर अमिट छाप छोड़ी।
- दूसरी पीढ़ी: इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए पूर्व आयकर अधिकारी श्री शिवाजी आहूजा ने मंच संभाला और 25 वर्षों तक लंकाधिपति के रूप में अपने सशक्त अभिनय का लोहा मनवाया।
- तीसरी पीढ़ी: वर्तमान में वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी एवं उद्घोषक (एंकर) श्री के. कुमार आहूजा पिछले 23 वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
रौद्र रूप के साथ वात्सल्य और स्नेह का संगम: श्री के. कुमार आहूजा जब अपने पारंपरिक परिधान, आभूषणों और रौद्र अट्टहास के साथ नगर परकोटे की झांकियों में निकलते हैं, तो उनका व्यक्तित्व देखते ही बनता है। एक ओर जहां उनका गर्जनापूर्ण अट्टहास दर्शकों में रोमांच भर देता है, वहीं दूसरी ओर उनका वात्सल्य भाव भी देखने को मिलता है। वे मार्ग में नन्हे बच्चों को आशीर्वाद देते हैं तथा उन्हें टॉफियां, बिस्कुट और प्रसाद वितरित करते हुए आगे बढ़ते हैं।
समाज में मिला 'मंदोदरी भाभी' का आदर: इस किरदार का प्रभाव सिर्फ मंच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। व्यास कॉलोनी, सेक्टर नंबर 5 स्थित उनके निवास के आसपास रहने वाले पड़ोसी एवं परिचित उनकी धर्मपत्नी को अत्यंत आदर व अपनत्व के साथ "मंदोदरी भाभी" कहकर पुकारते हैं, जिसे सुनकर पूरा परिवार गौरवान्वित महसूस करता है।
अंतिम अभिलाषा: जीवन के 68 बसंत देख चुके श्री के. कुमार आहूजा ने अपनी आत्मीय भावना व्यक्त करते हुए कहा कि वे अपनी कला को प्रभु की सेवा मानते हैं। उन्होंने कहा, "मैंने जीवन के 68 वर्ष पूरे कर लिए हैं। अब मेरी अंतिम इच्छा यही है कि मंच पर प्रभु श्री राम के साथ युद्ध का सजीव अभिनय करते हुए अपने प्राण उनके श्रीचरणों में समर्पित करूँ।"

